कछवाह वंश की उत्पत्ति हुई थी नरवर से .....

शिवपुरी | नरवर की स्थापना राजा नल ने की थी। भगवान राम के पुत्र कुश से कुशवाह या कछवाह वंश की उत्पत्ति हुई थी। कुश का पुत्र अतिथि और उसका पुत्र निषध था। इसी निषध के पुत्र नल ने रोहतासगढ़ से पश्चिम दिशा में आकर नलपुर- नलवर या नरवर को बसाया था। नल का पुत्र ढोला, ढोला का पुत्र लक्ष्मीसेन, और लक्ष्मीसेन का पुत्र वज्र धाम, वज्र धाम का पुत्र मंगलराय, मंगलराय का पुत्र कतराय उर्फ कीर्ति राज ,कतराय का पुत्र मूलदेव और मूलदेव का पुत्र पदमपाल और पदमपाल का पुत्र सूर्यपाल और सूर्यपाल का पुत्र महीपाल था। इस वंश का अंतिम शासक दूल्हा देव अपने भांजे परमादेव प्रतिहार को नरवर से विस्थापित कर दिया गया। था। यह घटना 1127 ई सन की है। प्रतिहारों को कुछ समय बाद गिरि के गिरंद्र के स्वामी परमादि देव के पुत्र चाहड के द्वारा विस्थापित किया गया। 1234 ई. सन में चाहड़ देव ने नरवर आकर नए साम्राज्य जज्पेल्ल या यजपेल वंश की स्थापना की। सन 1254 में चाहड़ की मृत्यु के उपरांत नरवर्मनदेव नरवर का शासक बना। इसके पुत्र आसल्यदेव ने अपनी रानी लावण्यदेवी और प्रधानमंत्री देवधर की सहायता से नरवर राज्य की सीमाओं का भारी विस्तार किया। आसल्य देव का उत्तराधिकारी गोपाल देव गणपति था। सन 1294 में इसकी पराजय अलाउद्दीन खिलजी के हाथों हुई और इस वंश का अंतिम शासक कहलाया। इसके बाद 1शताब्दी तक नरवर मुस्लिम सुल्तानों के अधीन रहा। इसके बाद 1400 से 1527 तक नरवर पर तोमर शासकों को अधिकार आ गया। यहां राजा अचल ब्रह्मा ने तोमर शासन की नींव डाली थी। इसके बाद वर्ष 1642 में औरंगजेब ने अमर सिंह को नरवर की गद्दी सौंपी।21 फरवरी 1707 में औरंगजेब की मृत्‍यु के बाद इस किले पर उसके बेटे बहादुरशाह का राज रहा। उसने ये किला खांडेराव को सौंप दिया। 1804 में सिंधिया ने शिवपुरी पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद वर्ष 1900 में जीवाजी राव ने सिंधिया ने इस किले का जीर्णोद्धार कराया था।

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